लद्दाख इतिहास के आईने में एक स्वतन्त्रता सेनानी
Abstract
चीन और पाकिस्तान की सीमाओं के बीच स्थित संपूर्ण लद्दाख क्षेत्र में अब्दुल सत्तार एक मात्र ऐसे स्वतन्त्रता सेनानी थे, जिन्होंने अपने अदम्य साहस और निर्भीकता के बल पर दुर्गम पहाड़ियों के बीच स्थित अपने लद्दाख क्षेत्र में आजादी की अखिल मशाल जलाई थी और ब्रिटिश सरकार की जन विरोधी नीति का डटकर सामना किया था तथा अपनी इसी सूझ-बूझ और देश-प्रेम की भावना से ओत-प्रोत (भरपूर) होने के कारण अपने लद्दाख क्षेत्र के अधिकांश लोगों को कमजोर हो चुके डोगरा शासन में ब्रिटिश सरकार की इन जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ ला खड़ा कर दिया था और स्वतन्त्रता सेनानी अब्दुल सत्तार ब्रिटिश सरकार के अत्याचारों की परवाह न करते हुए देश की आजादी के लिए कारगिल स्थित स्कर्दो कारागार में 6 महीना नजरबन्द (कैद) रहे थे तथा इन्होंने इस कारागार में ब्रिटिश सरकार के अमानवीय अत्याचार सहे थे और ये अत्याचार इतने क्रूर (कठोर) थे कि ब्रिटिश सरकार ने इनका कारावास के दौरान एक पैर भी काट दिया था। संविधान निर्माता बाबा साहेब डाॅ. अम्बेडकर से राजधानी दिल्ली में हुई मुलाकात का एक बड़ा सार्थक प्रभाव यह हुआ कि स्वतन्त्रता सेनानी अब्दुल सत्तार में सामाजिक तथा धार्मिक सहष्णुता की भावना और अधिक मजबूत हुई थी और इसी सार्थाक प्रभाव के कारण अब्दुल सत्तार ने सम्पूर्ण लद्दाख में बौद्ध-मुस्लिम समुदायों के लोगों के बीच आपसी सामाजिक और धार्मिक सहष्णुता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। अब्दुल सत्तार के इसी अमन-चैन परस्ती दृष्टिकोण के कारण लद्दाख में गंगा-जमुनी संस्कृति (ब्वउचेपजम ब्नसजतनम) और अधिक मजबूत हुई। स्वतन्त्रता सेनानी स्वतन्त्रता सेनानी अब्दुल सत्तार संपूर्ण लद्दाख क्षेत्र का एकमात्र ऐसा जगमगता सितारा है, जो लद्दाख के सभी लोगों को अपने देश के प्रति हमेशा मर-मिटने की अमिट सीख देता है।
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